Wednesday, 26 September 2012

सेकेंड हैंड लव

ड्रीम वर्ल्ड कॉलेज का फेयरवेल फंक्शन चल रहा था। पूरा हॉल गुब्बारों और रंग-बिरंगी झालरों से सजा हुआ था। लोगों के जोर-जोर से खुशी के चिल्लाने का आवाज आ रही थी। पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज रहा था, पर जैसे ही पंकज का नाम एनांउस हुआ, पूरे हॉल में सन्नाटा पसर गया। पंकज सर झुकाए हॉल के एक कोने में बैठा था। उसे इस बात का होश ही नहीं था कि उसके आस-पास क्या हो रहा है। पंकज के दोस्त शोभित ने उसे झकझोरा,
पंकज जा तेरा नाम एनांउस हुआ है, डायरेक्टर सर कब से बुला रहे है। डिग्री नहीं लेनी क्या?”
पंकज ने सर उठाकर एक नजर अपने चारों तरफ दौड़ाई। सब उसे ही घूर रहे थे, जैसे वो किसी म्यूजियम में रखा अद्भुत पुतला हो या फिर किसी सर्कस का जोकर।
पंकज उठा और डिग्री लेकर वापस उसी कोने में बैठ गया। पंकज की हालत कॉलेज में किसी से नहीं छुपी थी। वो हमेशा अव्वल नंबर से पास होने वाला और यारों का यार कहलाने वाला इंसान था। 3 सालों से डिग्री मिलने के इंतजार करने वाले पंकज को आज उसके मिलने की जरा भी खुशी नहीं थी या उसे इस खुशी की एहसास ही नहीं था। पंकज के लिए प्रिया को खोने का दर्द इतना ज्यादा बड़ा था कि उसके आगे आज उस सपने की भी कोई एहमियत नहीं थी जिसे लेकर वो शहर पढ़ने आया था।
कभी-कभी ऐसा लगता था कि मानों पंकज की किस्मत ने उसके लिए सिर्फ मुसीबतें ही लिखी थी। पंकज के गांव में स्कूल नहीं था इसलिए अपने कस्बे से 18 किमी. दूर साइकिल चलाकर कंकरीले-पथरीले रास्तों का पार कर स्कूल पढ़ने जाया करता था। 12वीं तक की पढ़ाई में पंकज अव्वल नंबरों से पास हुआ। पंकज आगे पढ़ने के लिए बमुश्किल अपने माता-पिता को मनाकर शहर पढ़ने आ गया। पंकज के अच्छे नंबरों और मेहनत के चलते उसे शहर में स्कॉलरशिप मिल रही थी।
कॉलेज का पहला दिन था, पंकज की आंखों में एक अलग ही चमक थी। सब एक-दूसरे से परिचय करने में लगे थे कि तभी क्लास में प्रिया की एंट्री होती है। लंबे-लंबे बाल, चेहरे पर आती पतली से लट, आंखों में काजल लगाए, लाल टॉप और ब्लू जींस पर करीब 5 इंच की सैंडिल पहने प्रिया कमाल लग रही थी। क्लास के सभी लड़के तो उसे मुंह खोले देखते रह गए जैसे सदियों से भूखे भिखारियों के आगे किसी ने लजीज व्यंजन रख दिए हो।
हाय, प्रिया शोभा ने पीछे से प्रिया के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।
ओ हाय प्रिया बोली
शोभा,प्रिया की दोस्त थी। दोनों आपस में बातें करने लगी। प्रिया पढ़ाई में ज्यादा होशियार नहीं थी पर बेहद घमंडी थी।अपना मतलब निकालने के लिए वो कुछ भी कर सकती थी। जैसे ही उसे पता चला कि पंकज क्लास का सबसे होशियार लड़का है, बस फिर क्या था उसने पंकज से दोस्ती कर ली। पंकज जो पहली ही नजर में उसे अपना दिल दे बैठा था भला मना कैसे करता। पंकज कॉलेज के पास ही एक हॉस्टल में रहता था। रोज शाम को पंकज, मान, रंजन और अमित साथ में चाय पीते हुए गप्पे मारते, चारों रूममेट थे और चारों की आपस में खूब पटती थी।
क्या पंकज आज कल प्रिया से बढ़ी पट रही है, हां??”...मान ने चुटकी लेते हुए कहा।
नहीं यार, ऐसा कुछ भी नहीं है, हम सिर्फ अच्छे दोस्त हैं।पंकज ने कुछ सफाई सी देते हुए कहा।
क्या लगती है यार!!”रंजन ने आह भरते हुए कहा।
अरे मैंने तो सुना है कि उसका एक ब्वायफ्रेंड भी है, संभल कर पंकज भाई दिल का मामला है तो सोचा बता दूं।अमित ने पंकज को चेताते हुए कहा।
तुम लोग भी न पता नहीं क्या फालतू करते होपंकज ने बात को वहीं खत्म करने के मूड से कहा।
अरे संभल कर यार, ये लड़कियां भी न बड़ी छुपी रूस्तम होती है। कभी जाहिर ही नहीं होने देती कि इनके दिल में क्या है और दिमाग में क्या खिचड़ी पक रही है मान ने ऐसे कहा जैसे लड़कियों के मामले में तो उसने पीएचडी कर रखी हो।
अरे जब भगवान इन्हें नहीं समझ पाया तो तुम पंकज भाई तुम किस खेत की मूली हो।रंजन ने अमित को ताली मारते हुए कहा।
अब बस भी करो और कल के टेस्ट की तैयारी नहीं करनी क्या ? “ पंकज ने पूछा।
भई तू ही कर ले तैयारी, तुझे ही प्रिया की हेल्प करनी है। हममें से तो किसी को वो घास भी नहीं डालती है। अमित हंसते हुए बोला।
कॉलेज के साथ साथ पंकज और प्रिया की दोस्ती चलती रही। पंकज प्रिया को महंगे-महंगे गिफ्ट लाकर देता, प्रिया जो कुछ भी पंकज से मांगती पंकज उसे लाकर देता। गिफ्ट देने और मिलने के इस सिलसिले लगातार चलता रहा। कॉलेज में भी पंकज और प्रिया के चर्चे होना आम बात हो गई।एक रात पंकज और प्रिया रॉयल रेस्टोरेंट में बैठे डिनर कर रहे थे ।
प्रिया, बुरा न मानो तो तुमसे एक बात पूछूं??”
हां पूछो न।प्रिया ने पंकज के दिए नए फोन में बिजी होते हुए कहा।
तुम्हारा कोई ब्वायफ्रेंड है??”
ब्वायफ्रेंड”… प्रिया नाक को सिकुड़ते हुए बोली, “नहीं मेरा कोई ब्वायफ्रेंड नहीं है, पर तुम ये क्यों पूछ रहे हो
नहीं, बस यूं ही..ये पनीर की सब्जी कितनी अच्छी है न पंकज ने बात काटने के अंदाज में कहा
यूं तो पंकज और प्रिया की दोस्ती को 3 साल होने वाले थे और कॉलेज खत्म होने वाला था। पर इन 3 सालों में पंकज कभी भी अपने दिल की बात प्रिया से नहीं कह पाया।  आज पंकज बार-बार करवट बदल रहा था, न खाने में ध्यान में था न पढ़ने में। आज शाम जब पंकज ने प्रिया को मिलने बुलाया था तो प्रिया ने तबियत खराब होने का बहाना बना दिया था पर फिर वो लड़का कौन था जिसके साथ आज प्रिया घूम रही थी। पंकज ने फैसला कर लिया था कि दो दिन बाद कॉलेज का आखिरी दिन है, अब चाहे जो हो जाए वो अपने दिल की बात प्रिया को बता कर रहेगा। रविवार था और कॉलेज की छुट्टी थी, पंकज ने पूरे दिन का प्लान पहले ही बना लिया था। सुबह 10 बजे पंकज और प्रिया ने पहले घंटों मॉल में वक्त बिताया फिर साथ में लंच और रात का डिनर भी साथ ही किया। इस दौरान पंकज ने प्रिया को अपने दिल की बात कही।
प्रिया, आई लव यू। क्या तुम अपनी सारी जिंदगी मेरे साथ गुजारना चाहोगी, मेरा मतलब क्या तुम मुझसे शादी करोगी
शादी???”प्रिया चौंकती हुई बोली। ओह माई गॉड पंकज तुम्हारा दिमाग तो ठीक है न। यह क्या बहकी बहकी बातें कर रहे हो तुम
प्रिया तुम क्या कह रही है। हम अच्छे दोस्त है और इतने वक्त से साथ है तो...पंकज अपनी बात पूरी कर पाता उससे पहले ही प्रिया बोल पढ़ी
तो क्या तो तुम्हें लगा कि मैं तुमसे प्यार करती हूं। देखो पंकज मुझे नहीं पता कि तुम इन सबका मतलब इस तरह निकालोगे और वैसे भी मैं किसी और से प्यार करती हूं ।दिसंबर में हमारी शादी है और उसके बाद मैं हमेशा के लिए यूएसए चली जाऊंगी। और मैंने तुमसे कभी भी प्यार नहीं किया।
पंकज के सपनों का घर ताश के पत्तों की तरह ढह गया। प्रिया न जाने क्या-क्या बोल कर चली गई पर पंकज के कानों में तो बस यही गूंज रहा था कि उसने उससे कभी प्यार नहीं किया। पंकज रात भर सड़क के किनारे बैठा रहा। सब जान चुके थे कि प्रिया और पंकज के बीच क्या हुया। कॉलेज के फंक्शन के बाद पंकज दूसरे शहर चला गया ये सोच कर की वो अपने अतीत से भाग जाएगा पर वास्तव में भाग तो पंकज खुद से रहा था ।
     नए शहर में पंकज की डिग्री और काबिलियत के बल पर पंकज को नौकरी मिल गई। नौकरी मिलने के बाद पंकज खुद को व्यस्त रखने की बेतहाशा कोशिश करता पर प्रिया के हिस्से का वक्त अकेले गुजारने में नाकाम होता। पंकज ने सबसे दूरी बढ़ा ली थी औऱ एक अपार्टमेंट में जो कि अब उसका घर था रहने लगा। हर महीने घर पैसे भेज दिया करता। मां जब भी फोन करती तो काम की व्यस्तता और थकान का बहाना बना कर पंकज फोन काट दिया करता। 1 साल होने चला था पर प्रिया की कही बातें, उसके साथ बिताया वक्त पंकज के ज़हन में आज भी उतना ही ताजा था , जितना की 1 साल पहले। प्रिया की यादों से छुटकारा पाने के लिए पंकज ने खुद को और व्यस्त रखना शुरू कर दिया। सुबह सबसे पहले ऑफिस आता और अक्सर डबल शिफ्ट करने के बाद घर पहुंचता। घर पहुंचने की उसे कोई जल्दी भी नहीं थी वैसे भी कौन है जो उसका इंतजार कर रहा होगा। पंकज ने अब एक नया और सबसे अच्छा दोस्त बना लिया था...कम्प्यूटर...जिंदगी बस घर से दफ्तर और दफ्तर से ऑफिस तक ही सिमट कर रह गई थी..न किसी से मिलना,,,न बात करना बस हर वक्त कम्पयूटर में उलझे रहना और जब कम्प्यूटर नहीं होता तो प्रिया की यादों में उलझे रहना। पंकज हमेशा से ऐसा कहां था वो तो बेहद खुशमिजाज था पर प्रिया के जाने के बाद सब बदल गया था, अकेलेपन की इस दर्द भरी जिंदगी में वो खुद को बहुत पीछे छोड़ आया था।
 एक दिन पंकज की जिंदगी में खुशी आई। खुशी पंकज की कलीग थी और उसकी ही शिफ्ट में काम करती थी। खुशी पंकज के बगल वाली सीट पर ही बैठती। काम के चलते दोनों दिन में ढेर सारा वक्त एक साथ बिताते। खुशी बिल्कुल अपने नाम के तरह थी। वो पंकज से हल्की-फुल्की मगर ढेर सारी बातें करती। मसलन उसे बारिश बहुत पंसद है, आज आलू के पराठे बनाए है खाओगे?, तुमने वो शाहरूख की नई मूवी देखी?अरे इतने गुमसुम क्यों रहते हो हमेशा तुम पर तो वो गज़ल बिल्कुल फिट बैठती है...
कौन सी पंकज ने पूछा
चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है…”
पंकज हल्का सा मुस्कुराया। पंकज की जिंदगी में प्रिया के साथ बिताए लम्हें खुशी के आने के बाद उथल-पुथल करने लगे थे। वो खुशी से वो सब बातें करने लगा था जो कभी वो प्रिया से किया करता था। गुजरते वक्त के साथ कम्प्यूटर के अलावा अब खुशी भी पंकज की अच्छी दोस्त बन गई थी। पंकज को इस बात का एहसास बखूबी था कि प्रिया के जाने के बाद उसकी जिंदगी कितनी तन्हा हो गई थी, लेकिन खुशी के आने के बाद पंकज की जिंदगी का ये खालीपन भरने लगा था। अब पंकज प्रिया को कहीं न कहीं भूलने लगा था। रोज की तरह पंकज आज भी खुद में उलझा था पर इस बार वो प्रिया की यादों में नहीं बल्कि खुशी की बातों में उलझा था। पंकज एक बार फिर से हंसना सीख गया था, वैसे ही जैसे कॉलेज के दिनों में दोस्तों के साथ मंडली लगा कर हंसा करता था।यूं तो खुशी से मिले पंकज को ज्यादा वक्त नहीं हुआ था पर ऐसा लगता था कि मानों बरसों पुराने कोई दो दोस्त हो। जल्द ही पंकज और खुशी की दोस्ती प्यार में बदल गई। जिंदगी के दिए बुरे अनुभवों से पंकज बहुत कुछ सीख चुका था और इस बार अपनी किस्मत को खुद से खेलने नहीं देना चाहता था। ऑफिस के बाद खुशी के साथ में घर जाते हुए पंकज ने अचानक घुटनों के बल बैठते हुए कहा
खुशी, विल यू मैरी मी?? “पंकज ने खुशी की तरफ अपनी हाथ बढ़ाते हुए पूछा।
खुशी ने पहले तो पंकज की तरफ देखा, फिर शर्मा कर सड़क के चारों ओर खड़े लोगों की तरफ, जो बिल्कुल अंजान थे पर यस कहने को बोल रहे थे।
खुशी ने फिर पंकज की आंखों में देखा और उसके बढ़ाए हाथ पर अपना हाथ रखते हुए बोली
यस
पंकज ने खुशी को गले लगा लिया और आस-पास खड़े लोग ताली बजाने लगे।
खुशी के माता-पिता काफी सालों पहले एक हादसे में उसे छोड़ के जा चुके थे। उनके जाने के बाद उसके बाकी अपनों ने भी उसे ऐसे झटक दिया था जैसे अचानक किसी ओर से उड़कर आए कीड़े को झटक दिया जाता है। पंकज के घरवाले जो न जाने पिछले कितने वक्त से उसे शादी करने को कह रहे थे, उसकी शादी की बात से खुश थे। जिदंगी बिल्कुल तय पन्नों के हिसाब से पलट रही थी।खुशी के पैर ही जमीन पर नहीं पड़ते थे।
मैंने सारे अरेंजमेंट कर लिए है, तुम कल ठीक 10 बजे कोर्ट पहुंच जाना।पंकज ने खुशी को Sk बार फिर याद दिलाते हुए कहा।
मां हम अगले हफ्ते शादी करके गांव आ रहे है पंकज ने मां से फोन पर बात करते हुए कहा।
पंकज के माता पिता बेहद खुश थे। ऐसा लग रहा था कि ढेर सारी काली अंधियारी रातों के बाद दिवाली आने वाली हो। अगले दिन पंकज समय से पहले ही कोर्ट पहुंच गया।सारे दोस्त भी आ गए थे जो विटनेस बनकर साइन करने वाले थे।पंकज पिछले 15 मिनट में खुशी को10 बार फोन करके पूछ चुका था कि वो घर से निकली या नहीं।11वीं बार पंकज ने खुशी को फोन मिलाकर पूछा
घर से निकली य़ा नहीं??”
हां निकली ली...ऑटो, ऑटो खुशी ने मेन रोड पर आकर ऑटो को आवाज देते हुए कहा।
आज मैं बहुत खुश हूं...आई लव यू पंकज
आई लव यू टू खुशी..तुमसे मिलकर लगा कि जिंदगी का अधूरापन अब पूरा हो गया है। अच्छा अब तुम जल्दी आओ।
खुशी ने हां कहकर फोन काट दिया।10 मिनट बाद खुशी कोर्ट पहुंच चुकी थी। खुशी ऑटो से उतरकर सड़क के दूसरी पार खड़े पंकज की ओर बढ़ रही होती है, लेकिन अचानक तेज रफ्तार से आता एक ट्रक खुशी के साथ साथ पंकज की खुशियों को भी रौंद कर चला गया। खुशी ने पंकज की बाहों में ही दम तोड़ दिया और पंकज तकदीर के खेले हुए इस एक औरतमाशे को बुत बनकर देखता ही रह गया। खुशी की मौत के बाद पंकज पूरी तरह टूट गया और एक बार फिर वो शहर छोड़कर चला गया।कहां?? कोई नहीं जानता....

Sunday, 26 August 2012

MY WORK

SUSHMITA SEN
KATRINA KAIF



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           PADCHINH LOGO


HUM TUM CARTOO0N CHARACTERS

Thursday, 26 July 2012

पहली सालगिरह


रेस्टोरेंट में बैठी में रौनक का इंतजार कर रही थी। कितनी अजीब बात है कि पहले तो समय से 2 घंटे पहले ही पहुंच जाया करता था और आज मैं उसका इंतजार कर रही हूं। उसका इंतजार करते हुए मैं पुरानी यादों में खो गई। वक्त कितनी जल्दी गुजर जाता है और पता ही नहीं चलता। आज भी ऐसा लगता है जैसे मानो कल की ही बात हो। किसी ने सही है कहा है कि प्यार जब आपकी चौखट पर दस्तक देता है तो वह अकेले नहीं आता, बल्कि अपने साथ ढेर सारी खुशियां, ढेर सारे हसीन पल और ढेर सारे आंसू भी लाता है। इंसान बिना पानी में पैर रखे समंदर तो पार कर सकता है पर बिना आंसू बहाए सच्चा प्यार नहीं कर सकता। उसके प्यार ने मेरी जिंदगी की हर कमी को पूरा किया, मुझे हर खुशी दी, मेरी छोटी-छोटी चीजों का ख्याल कब मुझसे ज्यादा उसे होने लग गया पता ही नहीं चला। उसके प्रपोजल एक्सेप्ट करने के बाद पहली बार हम किसी और रिश्ते के रूप में मिल रहे थे।
        उस दिन उसे देखकर एक अजीब सी शर्म महसूस हुई। हम दोनों का एक-दूसरे को देखने का नजरिया पूरी तरह से बदल चुका था। कॉलेज के बाद हम अपने पंसदीदा रेस्टोरेंट में गए जहां हम अक्सर जाया करते थे, पर आज एक नए रिश्ते के रूप में वहां गए थे। इस नए रिश्ते का अहसास बहुत ही प्यार और सुरक्षा देने वाला था। जहां मैं बिना कुछ सोचे समझे बेहिचक उससे बातें किया करती थी, वहीं आज उससे कुछ कहने के लिए ऐसे सोचना पड़ रहा था जैसे मानो मैं कैमिस्ट्री का एग्जाम दे रही थी। कैमिस्ट्री के एग्जाम में भी मैंने शायद इतना नहीं सोचा होगा। उस वक्त ऐसा लग रहा था कि आस-पास बैठे सारे लोग एग्जामनर है और घूर घूर कर हमें ही देख रहे हो। बहुत देर बात उसने बात शुरू करते हुए कहा,
जब तुम्हारा जवाब हां में मिला, तो मुझसे रहा नहीं गया।
मतलब???”
मतलब मैं रात के दो बजे शौर्य के घर गया और उसे जगाकर बताया कि तुमने मेरा प्रपोजल एक्सेप्ट कर लिया है।
मैं खिलाखिलाकर हंस दी। समझ नहीं आया कि इसे उसकी मासूमियत कहूं या नादानी कहूं या फिर अपने प्यार को पा लेने की खुशी।
क्यों???” मैंने पूछा
क्योंकि मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि सच में तुम मुझे मिल गई हो
फिर???”
फिर क्या वो नींद में था और सो गया, पर मैं रात भर सो नहीं पाया।
मैं मुस्कराई, कॉफी पीने के बाद हम अपने अपने घर चले गए।
पागल था वो, रात को 11-11 बजे सिर्फ पांच मिनट मुझे देखने के लिए 14 किलोमीटर दूर से आया करता था और मेरे घर के सामने वाली शॉप पर खड़ा हो जाता था। कोई देख न ले इस डर से मैं उसे घर जाने को कहती, सच कहूं तो मैं बिल्कुल नहीं चाहती थी कि वो जाए। मुझे अच्छा लगता था उसका पांच मिनट मुझे देखने इतनी दूर से आना, मेरी हर जिद को पूरा करना फिर चाहे वो लाल चौक पर बनवारी की चाट खाना हो या कुल्फी के ठेले के किनारे दो-दो चुस्कियों को एक साथ खाना हो, फिर चाहे कॉलेज के ग्राउंड में मुझे क्रिकेट खिलाना हो या फिर दूर अपनी बाइक पर घुमाना हो। मेरी छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी जिद को वो पूरा करता था।
           मैं एक अल्हड़ किस्म की लड़की थी और वो बेहद समझदार था। आज भी यकीन नहीं आता कि आखिर कैसे उसे मुझसे प्यार हो गया वो भी पहली नजर में। कितना फिल्मी लगता है न, वैसे मैं खुद भी बहुत फिल्मी थी। बात बात पर फिल्मों के डायलॉग मारना और गाना गाना तो जैसे मेरी आदत थी। जब फिल्मों में पहली नजर के प्यार के बारे में तो अक्सर सोचा करती थी कि क्या ऐसा होता है या शायद मैं जानती थी कि ऐसा होता है पर मानना नहीं चाहती थी। मेरी हमेशा से एक प्रॉब्लम रही है कि मैं किसी चीज को जानते हुए भी मानना नहीं चाहती थी। एक साल लगा दिया उसने अपने दिल की बात मुझसे कहने में।
          उसके इजहार के बाद शुरू हुए नए रिश्ते में जहां हमने कई हसीन लम्हें साथ बिताएं वहीं हमारे ढेर सारे झगड़े और लड़ाईयां भी हुई। गुस्सा तो जैसे हर वक्त उसकी नाक पर बैठा रहता था। कौन सी बात पर कब उसका मुंह फूल जाए पता नहीं। उसे मनाने में मुझे बहुत मेहनत करनी पड़ती थी पर उसे न जाने ऐसा कौन सा नुस्खा मालूम था जो वो फौरन मुझे मना लेता था। मुझे प्यार से गले लगा लेना, मेरी गोद में सिर रख देना या फिर कान पकड़ के उठक बैठक करना। कितने आसान नुस्खे है मुझे मनाने के ऐसा लगता था जैसे दादी मां के किसी खांसी या जुकाम के नुस्खे हो। पर उसे मनाना बहुत ही मुश्किल था। जब मेरे लाख मनाने के बाद भी वो नहीं मानता था तो मुझे बहुत रोना आता था। मेरे आंसू उस पर हमेशा काम कर जाते थे। वो सब बर्दाश्त कर सकता था पर मेरी आंखों में आंसू नहीं।
मैम ऑर्डर???”
वैटर था, काफी देर से ऑर्डर न करने पर खुद ही ऑर्डर लेने आ गया था।
वन कॉफी विद एक्सट्रा शुगर।
ओके मैम।
         मैनें टाइम देखने के लिए फोन निकाला। साढ़े बारह बज चुके थे। फोन से याद आया कि कॉलेज खत्म होने के बाद मुझसे फोन पर बात करने के लिए वो नए-नए तरीके अपनाया करता था। कभी क्लासेज, कभी नोट्स, कभी असाइनमेंट के बहाने तो कभी खुद ही फोन करके यह कहता कि मैंने मिस कॉल दी थी। हमारा रिश्ता बदलने के साथ साथ हमारे बीच बहुत कुछ बदल गया था। अब तो सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक उसी के ख्याल दिल और दिमाग पर छाए रहते। ऐसा लग रहा था जैसे मेरा दिल और दिमाग उसने अपने वश में कर लिया हो।
       मैं अपनी छोटी से छोटी बात उसे बताने लगी और उसकी हर बात जानने के लिए उत्सुक रहने लगी। उसने खाना खाया या नहीं, टाइम से घर पहुंचा या नहीं, रात को देर तक तो नहीं जागा, ऐसी कई छोटी छोटी बात हमारे या शायद मेरे लिए बहुत जरूरी होती चली गई। मैं अगर घर पहुंचने में 5 मिनट लेट हो जाऊं तो 4 कॉल आ जाते थे और खुद 4 घंटे भी लेट हो जाए तो कोई बात नहीं।क्या सब लड़के ऐसे होते हैं??? हमारे रिश्ते को पूरे हुए 6 महीने हो चुके थे। इसी बीच उसकी जॉब एक दूसरे शहर में लग गई। मैं उसके बिना कैसे रहूंगी ये सोच-सोच कर मेरी हालत खराब हो रही थी। मैं पूरे दो घंटे तक रोती रही और वो मेरी रोती हुई सूरत में फोटो खींच रहा था। मुझसे से जुड़ी हर याद को अपने साथ लेकर जाना चाहता था। मेरे बहुत रोने के बाद उसने मुझे अपने गले लगाया और कहा,
मैं कहीं भी रहूं तुमसे दूर तो कभी नहीं होऊंगा
सही ही तो कहा था उसने जो दिल में बसते है वो कहां कभी दूर होते है।
और मैं आया करूंगा न हर हफ्ते, अपनी आरजू से मिलने।
पक्का ना।
एकदम पक्का बेटा।

मैं तुम्हें एहसास ही नहीं होने दूंगा कि मैं तुमसे दूर दूसरे शहर में गया हूं।
ढेर सारे इंस्ट्रक्शन और आंसुओं के बाद उसके जाने का वक्त आ गया था। उसके जाने के बाद सब खाली खाली सा लगने लगा था। आदत हो गई थी न उसे रोज देखने की। उसके बिना एक एक दिन एक एक साल जैसा लग रहा था। याद तो उसे भी मेरी बहुत आती थी, पर..काम भी तो जरूरी था। वो अक्सर मुझए समझाया करता कि इस तरह अल्हड़पन से सारी जिंदगी नहीं चलती, लाइफ में सीरियस भी होना पड़ता है। कॉलेज खत्म हो चुका था और उसके जाने के बाद छुट्टियों में मेरे पास करने के लिए कुछ नहीं था। हालांकि अपने काम के बावजूद वो मुझे पूरा पूरा टाइम देता था पर शायद अब पहले जितना नहीं। जब किसी की आदत हो जाए तो उसे बदलना आसान नहीं होता और बदलाव से तो मैं हमेशा से ही डरती हूं।
          काम ज्यादा होने के कारण वो मुझसे अक्सर कहता कि बाद में बात करेगा। मैं उसके फोन और मैसेज का इंतजार करती। धीरे-धीरे काम का प्रेशर बढ़ने लगा और उसके ऑफिस का गुस्सा न चाहते हुए भी मुझ पर निकलने लगा। ऊपर से मेरी गलतियां कम होने का नाम नहीं ले रही थी।वो जिन चीजों को करने की मना करता न जाने कैसे और क्यूं वो मुझसे हो जाती थी। पूरे दिन काम की टेंशन और हमारे बीच की लड़ाई के कारण कहीं न कहीं उसने मुझे इग्नोर करना शुरू कर दिया। उसकी ये बेरूखी मुझे बर्दाश्त न होती और रात को बिस्तर में मैं फूट-फूट कर रोती। ऐसा नहीं था कि मुझसे लड़कर वो खुश रहता था वो तो और ज्यादा परेशान रहता था यह सोचकर कि उसने मुझे दुख दिया। यूं तो लड़के सबके सामने रोते नहीं पर मुझसे दूर होकर रहने का दर्द उसकी आंखों में मैंने बखूबी महसूस किया था। रात को जब सो जाते थे तो वो मुझे फोन करके बताता था कि वो मुझे कितना याद करता है।
जहां हम एक घंटे से ज्यादा एक-दूसरे से बात किए बिना नहीं रहते थे, वहीं अब हफ्ता न गुजर जाता था ठीक से बात हुए।हां कुछ औपचारिक बातें हो जाया करती थी। अक्सर अब वो मेरे फोन काटने लगा था और मेरे मैसेज का जवाब भी घंटों बाद देता था। इन सब दिक्कतों के बाद भी वो मुझसे मिलने आता रहा। एक दिन मैंने गुस्से में फोन ऑफ कर दिया, हमारी कॉमन फ्रेंड अदिति को मुझे कॉल आया।
तूने फोन क्यों ऑफ कर रखा है
सो रही थी
पता है रौनक कितना परेशान हो रहा है
फोन देखा तो उसमें 40 मिस कॉल और 53 मैसेज थे। मेरी नाराजगी खत्म नहीं हुई थी, मैंने फोन एक साइड रख दिया। मैं नाराज़ शायद उससे नहीं अपने आप से थी।
तुम दोनों के बीच सब ठीक तो है न???”
हां
यार वो बहुत परेशान है, उसके पास काम का बहुत प्रेशर है। तू प्लीज उससे मत लड़ा कर।
ठीक है। मैंने फोन काट दिया।
अदिति के शब्द बार बार मेरे कानों में गूंज रहे थे। अगर रौनक को कोई दिक्कत थी तो मुझसे कहना था किसी तीसरे को क्या हक। उस दिन मुझे बहुत बुरा लगा पर मैंने कुछ नहीं कहा न रौनक से और न अदिति से। जब उसने जाने की बात कही थी तो दिल में जिस बात का डर पैदा हो रहा था आज वो रहा था। काश मैंने उसे रोक लिया होता।धीर-धीरे वक्त गुजरने लगा, मैंने अपने लिए एक जॉब ढूंढ ली थी। अब हमारी बातें और भी कम होने लगी थी। दिन ब दिन हमारे बीच की बढ़ती दूरियों के चलते मैं सब ठीक होने की उम्मीद खो चुकी थी। फिर भी मैं रोज भगवान से दुआ करती कि हमारे रिश्ते में आई दरार किसी तरह खत्म हो जाए। रात का एक बजा था और दिल की तरह कमरे में इतना सन्नाटा पसरा था कि सुई तक के गिरने की आवाज साफ सुनी जा सकती थी। मैं छत की ओर देखते हुए बीते दिनों को याद कर रही थी कि अचानक फोन बजा। उसका फोन था।
हैलो!!!”
उसकी आवाज में एक अजीब सी उदासी, खालीपन, दूसरे शहर में अकेले रहने का दर्द था। कुछ देर फोन पर सन्नाटा पसरा रहा।मेरी तरह वो भी हमारी बीच की लड़ाईयों से खुश नहीं था।
आरजू, क्या फिर से सब कुछ पहले जैसा नहीं हो सकता?? क्या हम पहले जैसे साथ नहीं रह सकते?? मुझे भी तुमसे लड़ना अच्छा नहीं लगाता।
मैं मूक होकर उसकी बातें सुनती जा रही थी। जैसे रेगिस्तान में अचानक बारिश हो जाने की खुशी कुछ और होती है उसी तरह मेरी भी खुशी का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता था। मैं समझ नहीं पा रही थी, आखिर  कैसे उसे बताऊं कि मैं कितनी खुश हूं, पर वो मेरी खामोशी को भी अच्छे से समझता था और आज भी समझ गया था।
आधे घंटे बाद तुम्हारे घर की टेरिस पर आ रहा हूं। मैंने जॉब से रिजाइन दे दिया है, मेरे लिए तुमसे बढ़कर और कुछ नहीं।
आधे घंटे बाद हम साथ थे। एक दूसरे को ऐसे देख रहे थे जैसे एक लंबा वक्त गुजर गया हो। हमने एक दूसरे को कस कर गले लगा लिया ऐसे जैसे कोई प्यारी चीज खोने के बाद वापस मिल गई हो
हैप्पी एनिवर्सिरी आरजू!!”
तुम्हें याद था??”
इस दिन को मैं कैसे भूल सकता हूं।
आई लव यू, मैंने तुम्हें बहुत मिस किया।
मैंने भी, लव यू टू।
हम बिना कुछ बोले घंटों एक-दूसरे की बाहों में बैठे रहे
मैम आपकी कॉफी ठंडी हो गई है, गर्म कर लाऊं??’
नहीं बहुत भूख लगी है, हम कुछ खाएंगे।
मैं कुछ कह पाती इतने में पीछे से आवाज आ चुकी थी। रौनक था। रौनक के आने के साथ मेरा इंतजार खत्म हो चुका था।