Thursday, 26 July 2012

पहली सालगिरह


रेस्टोरेंट में बैठी में रौनक का इंतजार कर रही थी। कितनी अजीब बात है कि पहले तो समय से 2 घंटे पहले ही पहुंच जाया करता था और आज मैं उसका इंतजार कर रही हूं। उसका इंतजार करते हुए मैं पुरानी यादों में खो गई। वक्त कितनी जल्दी गुजर जाता है और पता ही नहीं चलता। आज भी ऐसा लगता है जैसे मानो कल की ही बात हो। किसी ने सही है कहा है कि प्यार जब आपकी चौखट पर दस्तक देता है तो वह अकेले नहीं आता, बल्कि अपने साथ ढेर सारी खुशियां, ढेर सारे हसीन पल और ढेर सारे आंसू भी लाता है। इंसान बिना पानी में पैर रखे समंदर तो पार कर सकता है पर बिना आंसू बहाए सच्चा प्यार नहीं कर सकता। उसके प्यार ने मेरी जिंदगी की हर कमी को पूरा किया, मुझे हर खुशी दी, मेरी छोटी-छोटी चीजों का ख्याल कब मुझसे ज्यादा उसे होने लग गया पता ही नहीं चला। उसके प्रपोजल एक्सेप्ट करने के बाद पहली बार हम किसी और रिश्ते के रूप में मिल रहे थे।
        उस दिन उसे देखकर एक अजीब सी शर्म महसूस हुई। हम दोनों का एक-दूसरे को देखने का नजरिया पूरी तरह से बदल चुका था। कॉलेज के बाद हम अपने पंसदीदा रेस्टोरेंट में गए जहां हम अक्सर जाया करते थे, पर आज एक नए रिश्ते के रूप में वहां गए थे। इस नए रिश्ते का अहसास बहुत ही प्यार और सुरक्षा देने वाला था। जहां मैं बिना कुछ सोचे समझे बेहिचक उससे बातें किया करती थी, वहीं आज उससे कुछ कहने के लिए ऐसे सोचना पड़ रहा था जैसे मानो मैं कैमिस्ट्री का एग्जाम दे रही थी। कैमिस्ट्री के एग्जाम में भी मैंने शायद इतना नहीं सोचा होगा। उस वक्त ऐसा लग रहा था कि आस-पास बैठे सारे लोग एग्जामनर है और घूर घूर कर हमें ही देख रहे हो। बहुत देर बात उसने बात शुरू करते हुए कहा,
जब तुम्हारा जवाब हां में मिला, तो मुझसे रहा नहीं गया।
मतलब???”
मतलब मैं रात के दो बजे शौर्य के घर गया और उसे जगाकर बताया कि तुमने मेरा प्रपोजल एक्सेप्ट कर लिया है।
मैं खिलाखिलाकर हंस दी। समझ नहीं आया कि इसे उसकी मासूमियत कहूं या नादानी कहूं या फिर अपने प्यार को पा लेने की खुशी।
क्यों???” मैंने पूछा
क्योंकि मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि सच में तुम मुझे मिल गई हो
फिर???”
फिर क्या वो नींद में था और सो गया, पर मैं रात भर सो नहीं पाया।
मैं मुस्कराई, कॉफी पीने के बाद हम अपने अपने घर चले गए।
पागल था वो, रात को 11-11 बजे सिर्फ पांच मिनट मुझे देखने के लिए 14 किलोमीटर दूर से आया करता था और मेरे घर के सामने वाली शॉप पर खड़ा हो जाता था। कोई देख न ले इस डर से मैं उसे घर जाने को कहती, सच कहूं तो मैं बिल्कुल नहीं चाहती थी कि वो जाए। मुझे अच्छा लगता था उसका पांच मिनट मुझे देखने इतनी दूर से आना, मेरी हर जिद को पूरा करना फिर चाहे वो लाल चौक पर बनवारी की चाट खाना हो या कुल्फी के ठेले के किनारे दो-दो चुस्कियों को एक साथ खाना हो, फिर चाहे कॉलेज के ग्राउंड में मुझे क्रिकेट खिलाना हो या फिर दूर अपनी बाइक पर घुमाना हो। मेरी छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी जिद को वो पूरा करता था।
           मैं एक अल्हड़ किस्म की लड़की थी और वो बेहद समझदार था। आज भी यकीन नहीं आता कि आखिर कैसे उसे मुझसे प्यार हो गया वो भी पहली नजर में। कितना फिल्मी लगता है न, वैसे मैं खुद भी बहुत फिल्मी थी। बात बात पर फिल्मों के डायलॉग मारना और गाना गाना तो जैसे मेरी आदत थी। जब फिल्मों में पहली नजर के प्यार के बारे में तो अक्सर सोचा करती थी कि क्या ऐसा होता है या शायद मैं जानती थी कि ऐसा होता है पर मानना नहीं चाहती थी। मेरी हमेशा से एक प्रॉब्लम रही है कि मैं किसी चीज को जानते हुए भी मानना नहीं चाहती थी। एक साल लगा दिया उसने अपने दिल की बात मुझसे कहने में।
          उसके इजहार के बाद शुरू हुए नए रिश्ते में जहां हमने कई हसीन लम्हें साथ बिताएं वहीं हमारे ढेर सारे झगड़े और लड़ाईयां भी हुई। गुस्सा तो जैसे हर वक्त उसकी नाक पर बैठा रहता था। कौन सी बात पर कब उसका मुंह फूल जाए पता नहीं। उसे मनाने में मुझे बहुत मेहनत करनी पड़ती थी पर उसे न जाने ऐसा कौन सा नुस्खा मालूम था जो वो फौरन मुझे मना लेता था। मुझे प्यार से गले लगा लेना, मेरी गोद में सिर रख देना या फिर कान पकड़ के उठक बैठक करना। कितने आसान नुस्खे है मुझे मनाने के ऐसा लगता था जैसे दादी मां के किसी खांसी या जुकाम के नुस्खे हो। पर उसे मनाना बहुत ही मुश्किल था। जब मेरे लाख मनाने के बाद भी वो नहीं मानता था तो मुझे बहुत रोना आता था। मेरे आंसू उस पर हमेशा काम कर जाते थे। वो सब बर्दाश्त कर सकता था पर मेरी आंखों में आंसू नहीं।
मैम ऑर्डर???”
वैटर था, काफी देर से ऑर्डर न करने पर खुद ही ऑर्डर लेने आ गया था।
वन कॉफी विद एक्सट्रा शुगर।
ओके मैम।
         मैनें टाइम देखने के लिए फोन निकाला। साढ़े बारह बज चुके थे। फोन से याद आया कि कॉलेज खत्म होने के बाद मुझसे फोन पर बात करने के लिए वो नए-नए तरीके अपनाया करता था। कभी क्लासेज, कभी नोट्स, कभी असाइनमेंट के बहाने तो कभी खुद ही फोन करके यह कहता कि मैंने मिस कॉल दी थी। हमारा रिश्ता बदलने के साथ साथ हमारे बीच बहुत कुछ बदल गया था। अब तो सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक उसी के ख्याल दिल और दिमाग पर छाए रहते। ऐसा लग रहा था जैसे मेरा दिल और दिमाग उसने अपने वश में कर लिया हो।
       मैं अपनी छोटी से छोटी बात उसे बताने लगी और उसकी हर बात जानने के लिए उत्सुक रहने लगी। उसने खाना खाया या नहीं, टाइम से घर पहुंचा या नहीं, रात को देर तक तो नहीं जागा, ऐसी कई छोटी छोटी बात हमारे या शायद मेरे लिए बहुत जरूरी होती चली गई। मैं अगर घर पहुंचने में 5 मिनट लेट हो जाऊं तो 4 कॉल आ जाते थे और खुद 4 घंटे भी लेट हो जाए तो कोई बात नहीं।क्या सब लड़के ऐसे होते हैं??? हमारे रिश्ते को पूरे हुए 6 महीने हो चुके थे। इसी बीच उसकी जॉब एक दूसरे शहर में लग गई। मैं उसके बिना कैसे रहूंगी ये सोच-सोच कर मेरी हालत खराब हो रही थी। मैं पूरे दो घंटे तक रोती रही और वो मेरी रोती हुई सूरत में फोटो खींच रहा था। मुझसे से जुड़ी हर याद को अपने साथ लेकर जाना चाहता था। मेरे बहुत रोने के बाद उसने मुझे अपने गले लगाया और कहा,
मैं कहीं भी रहूं तुमसे दूर तो कभी नहीं होऊंगा
सही ही तो कहा था उसने जो दिल में बसते है वो कहां कभी दूर होते है।
और मैं आया करूंगा न हर हफ्ते, अपनी आरजू से मिलने।
पक्का ना।
एकदम पक्का बेटा।

मैं तुम्हें एहसास ही नहीं होने दूंगा कि मैं तुमसे दूर दूसरे शहर में गया हूं।
ढेर सारे इंस्ट्रक्शन और आंसुओं के बाद उसके जाने का वक्त आ गया था। उसके जाने के बाद सब खाली खाली सा लगने लगा था। आदत हो गई थी न उसे रोज देखने की। उसके बिना एक एक दिन एक एक साल जैसा लग रहा था। याद तो उसे भी मेरी बहुत आती थी, पर..काम भी तो जरूरी था। वो अक्सर मुझए समझाया करता कि इस तरह अल्हड़पन से सारी जिंदगी नहीं चलती, लाइफ में सीरियस भी होना पड़ता है। कॉलेज खत्म हो चुका था और उसके जाने के बाद छुट्टियों में मेरे पास करने के लिए कुछ नहीं था। हालांकि अपने काम के बावजूद वो मुझे पूरा पूरा टाइम देता था पर शायद अब पहले जितना नहीं। जब किसी की आदत हो जाए तो उसे बदलना आसान नहीं होता और बदलाव से तो मैं हमेशा से ही डरती हूं।
          काम ज्यादा होने के कारण वो मुझसे अक्सर कहता कि बाद में बात करेगा। मैं उसके फोन और मैसेज का इंतजार करती। धीरे-धीरे काम का प्रेशर बढ़ने लगा और उसके ऑफिस का गुस्सा न चाहते हुए भी मुझ पर निकलने लगा। ऊपर से मेरी गलतियां कम होने का नाम नहीं ले रही थी।वो जिन चीजों को करने की मना करता न जाने कैसे और क्यूं वो मुझसे हो जाती थी। पूरे दिन काम की टेंशन और हमारे बीच की लड़ाई के कारण कहीं न कहीं उसने मुझे इग्नोर करना शुरू कर दिया। उसकी ये बेरूखी मुझे बर्दाश्त न होती और रात को बिस्तर में मैं फूट-फूट कर रोती। ऐसा नहीं था कि मुझसे लड़कर वो खुश रहता था वो तो और ज्यादा परेशान रहता था यह सोचकर कि उसने मुझे दुख दिया। यूं तो लड़के सबके सामने रोते नहीं पर मुझसे दूर होकर रहने का दर्द उसकी आंखों में मैंने बखूबी महसूस किया था। रात को जब सो जाते थे तो वो मुझे फोन करके बताता था कि वो मुझे कितना याद करता है।
जहां हम एक घंटे से ज्यादा एक-दूसरे से बात किए बिना नहीं रहते थे, वहीं अब हफ्ता न गुजर जाता था ठीक से बात हुए।हां कुछ औपचारिक बातें हो जाया करती थी। अक्सर अब वो मेरे फोन काटने लगा था और मेरे मैसेज का जवाब भी घंटों बाद देता था। इन सब दिक्कतों के बाद भी वो मुझसे मिलने आता रहा। एक दिन मैंने गुस्से में फोन ऑफ कर दिया, हमारी कॉमन फ्रेंड अदिति को मुझे कॉल आया।
तूने फोन क्यों ऑफ कर रखा है
सो रही थी
पता है रौनक कितना परेशान हो रहा है
फोन देखा तो उसमें 40 मिस कॉल और 53 मैसेज थे। मेरी नाराजगी खत्म नहीं हुई थी, मैंने फोन एक साइड रख दिया। मैं नाराज़ शायद उससे नहीं अपने आप से थी।
तुम दोनों के बीच सब ठीक तो है न???”
हां
यार वो बहुत परेशान है, उसके पास काम का बहुत प्रेशर है। तू प्लीज उससे मत लड़ा कर।
ठीक है। मैंने फोन काट दिया।
अदिति के शब्द बार बार मेरे कानों में गूंज रहे थे। अगर रौनक को कोई दिक्कत थी तो मुझसे कहना था किसी तीसरे को क्या हक। उस दिन मुझे बहुत बुरा लगा पर मैंने कुछ नहीं कहा न रौनक से और न अदिति से। जब उसने जाने की बात कही थी तो दिल में जिस बात का डर पैदा हो रहा था आज वो रहा था। काश मैंने उसे रोक लिया होता।धीर-धीरे वक्त गुजरने लगा, मैंने अपने लिए एक जॉब ढूंढ ली थी। अब हमारी बातें और भी कम होने लगी थी। दिन ब दिन हमारे बीच की बढ़ती दूरियों के चलते मैं सब ठीक होने की उम्मीद खो चुकी थी। फिर भी मैं रोज भगवान से दुआ करती कि हमारे रिश्ते में आई दरार किसी तरह खत्म हो जाए। रात का एक बजा था और दिल की तरह कमरे में इतना सन्नाटा पसरा था कि सुई तक के गिरने की आवाज साफ सुनी जा सकती थी। मैं छत की ओर देखते हुए बीते दिनों को याद कर रही थी कि अचानक फोन बजा। उसका फोन था।
हैलो!!!”
उसकी आवाज में एक अजीब सी उदासी, खालीपन, दूसरे शहर में अकेले रहने का दर्द था। कुछ देर फोन पर सन्नाटा पसरा रहा।मेरी तरह वो भी हमारी बीच की लड़ाईयों से खुश नहीं था।
आरजू, क्या फिर से सब कुछ पहले जैसा नहीं हो सकता?? क्या हम पहले जैसे साथ नहीं रह सकते?? मुझे भी तुमसे लड़ना अच्छा नहीं लगाता।
मैं मूक होकर उसकी बातें सुनती जा रही थी। जैसे रेगिस्तान में अचानक बारिश हो जाने की खुशी कुछ और होती है उसी तरह मेरी भी खुशी का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता था। मैं समझ नहीं पा रही थी, आखिर  कैसे उसे बताऊं कि मैं कितनी खुश हूं, पर वो मेरी खामोशी को भी अच्छे से समझता था और आज भी समझ गया था।
आधे घंटे बाद तुम्हारे घर की टेरिस पर आ रहा हूं। मैंने जॉब से रिजाइन दे दिया है, मेरे लिए तुमसे बढ़कर और कुछ नहीं।
आधे घंटे बाद हम साथ थे। एक दूसरे को ऐसे देख रहे थे जैसे एक लंबा वक्त गुजर गया हो। हमने एक दूसरे को कस कर गले लगा लिया ऐसे जैसे कोई प्यारी चीज खोने के बाद वापस मिल गई हो
हैप्पी एनिवर्सिरी आरजू!!”
तुम्हें याद था??”
इस दिन को मैं कैसे भूल सकता हूं।
आई लव यू, मैंने तुम्हें बहुत मिस किया।
मैंने भी, लव यू टू।
हम बिना कुछ बोले घंटों एक-दूसरे की बाहों में बैठे रहे
मैम आपकी कॉफी ठंडी हो गई है, गर्म कर लाऊं??’
नहीं बहुत भूख लगी है, हम कुछ खाएंगे।
मैं कुछ कह पाती इतने में पीछे से आवाज आ चुकी थी। रौनक था। रौनक के आने के साथ मेरा इंतजार खत्म हो चुका था।