अनकही दास्तां
Wednesday, 20 June 2012
प्यार की इंतहा
चल रही है सांसे मगर हम तो कब के मर चुके है
दुनिया की भीड़ में कहीं आगे निकल चुके हैं
वो जो मेरा कभी था ही नहीं
फिर भी न जाने क्यूं उसके इंतजार में
अपनी सांसे उसके नाम कर चुके हैं
जिंदगी की उलझन
उलझी रही मैं जिंदगी की उलझनों में
और न जाने कब सूरज डल गया
खोई रही मैं हर पल जिसके ख्यालों में
वो मुझे पीछे छोड़ आगे निकल गया
ऐ मेरे दिल अब तो तू धड़कना बंद कर दे
जो देखा था मैंने उसके साथ रहने का ख्याब
वो तो तिनका तिनका टूट कर बिखरता चला गया
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